1. ज़ख्मी तो दोनों हुए, क्या हिंदू क्या मुसलमान |
     दीन-धरम नही जानते, ये बम-फोड़ू शैतान || 




  2.   चला मोर्चा दिल्ली को, लिए हाथ में तख्ती |
     अब भीड़ बताया करती है,किसकी कितनी हस्ती ||




  3.  हिंदू मुस्लिम की पहचान, खूब कराता है दंगा |
     खुदा भी डर जाता है, जब इन्सां हो जाए नंगा ||




  4.  प्रमोशन की लिस्ट में,  देखो बन्दर बाँट |
     मंत्री के रिश्ते में आ, या फिर तलवे चाट ||




  5.  मंत्री से संतरी तक, सबके सब हैं  भष्ट |
     गाड़ी कमाई जनता की, नित कर रहे नष्ट || 




  6.  देख दुर्दशा देश की, स्वर्ग में गांधी रोय |
     खादी वाले गुंडों से, कैसे छुटकारा होय ||




  7.  गठबंधन सरकार के, नियम न मोहे सुहाय |
     छोटी मछली तालाब की, बड़ी मछली को खाय ||

जब हमारा दिल चुराकर वो चले |
नाम ले ले कर हमारा सब जले ||

 

यह बता दे आज मुझे तू ऐ ख़ुदा |
किस दुआ के बदले वो मुझको मिले ||

 

मुस्कुरा कर जब कभी निकले कहीं |
उससे मिलने की ख़ुशी में गुल खिले ||

 

खुद से बढ़कर चाहता हूँ मैं तुझे |
तू कभी भी आज़माकर  देख ले  ||

 

लग न पाये अब किसी की भी नज़र |
प्यार अपना दिन-ब-दिन फूले फले ||

जीता हर बाज़ी मगर अव्वल नही समझा |
ख़ुद को कभी मैंने मुकम्मल नही समझा ||
 
ईबादत की तरह करता रहा मैं अपने काम |
पीर को पीर मंगल को मंगल नही समझा ||
 
दुआये लेता जा किसी के काम आता जा |
अफ़सोस इन बातों को आवारा बादल नही समझा ||
 
आज भी थाम लेता है हाथ ठोकर लगते ही |
हो गया हूँ मैं बड़ा, ये माँ का आँचल नही समझा ||
 
नाज़ है देश को उस सरहद के सिपाही पर |
सीना था छलनी, पर ख़ुद को घायल नही समझा ||
 
[ मुकम्मल = Complete, पीर = Monday ]

 

तन्हाई में तेरा दिल जोरों से धड़कता तो होगा |
मेरी गैर मौजूदगी का अहसास तुझे खलता तो होगा ||

 

लाख छुपा ले ख़ुद को ज़माने की नज़रों से |
उसे तेरी हरकतों का कुछ पता चलता तो होगा ||

 

अपने घर की दरवाजे-खिड़कियाँ बंद करने से क्या हासिल |
वो    सूरज  है,  वो   हर   रोज    निकलता   तो     होगा ||

 

देखकर  खून   से    लथपथ    जख्मी      इंसान |
ऐ दहशतगर्द तेरा भी कलेजा दहलता तो होगा ||

 

मेले के     झूले   खेल    तमाशों    को   देख |
सयानों तुम्हारा दिल बच्चो सा मचलता तो होगा ||

दिल कहता है  कही न आए जायें |
बस तुझे ही सोचे, और मुस्कुरायें ||

 

याद है हमे अपनी पहली मुलाकात |
वो चाँदनी रात, वो ठंडी हवायें ||

 

वो तेरा हुस्न तेरा बदन वो तेरी अदा |
जुल्फे थी तेरी, या थी काली घटायें ||

 

कितनी मासूम सी हैं ये पलके तेरी |
अश्क सिहर उठे, इन्हे कैसे रुलायें ||

 

चाँद ये तेरा आना बदलियों में छुप जाना |
मेरे महबूब से सीखी है क्या, ये सारी अदायें ||

 

जमाना अक्सर पूछता है उसके बारे में |
हम बताये भी यारो, तो क्या बतायें || 

                   तेरी चाहतें

 
ता- उम्र तेरी चाहतों का, सीने में एक सैलाब रहे |
खुदा ऐसी शब् न दे, जिसमे न तेरा ख्वाब रहे ||
 
 
तेरी आँखे है  या  समंदर  मय  का |
मेरे घर में एक भी ना, बोतल-ऐ-शराब रहे ||
 
एक सुहाने सफ़र सी होगी जिंदगी |
आसपास मेरे ग़र, तुझ जैसा एक अहबाब रहे ||
 
 
उठते है हाथ मेरे हर वक्त इस दुआ में |
क़यामत तक तू रहे, तेरा श़बाब रहे ||
 
 
चाँदनी रात में यूँ छत पर टहलना तेरा |
खुदा खैर करे, जब दो-दो माहताब रहे ||
 
[ शब् = Night , मय = Wine ,  अहबाब = Friend , माहताब = Moon ]

 मोहब्बत करने वाले कुछ अज़ीब होते हैं |
उनकी अलग दुनिया अलग तहज़ीब होते हैं ||

 
यूँ ही इत्तेफाकन नही मिला करते दो अजनबी |
सबके  अपने    अपने    नसीब होते हैं ||

 
हो ही जाती है रोजाना उनसे मुलाकात मेरी |
 मिलने के सौ बहाने हजार तरकीब होते हैं ||

 
दिल की बातो को हमेशा राज ही रखना |
इश्क में अक्सर अज़ीज़ दोस्त ही रकीब होते हैं ||

 
गोया कुछ दिनों से चल रहा है सब ठीक-ठाक |
वो दूर भी हों तो दिल के करीब होते हैं ||

 

[ तहज़ीब = Customs or Rituals , रकीब = Rival ]